आज पता नही मन क्यों बाहरी हो रहा है ऐसा लग रहा है की कितना सारा बोज लेकर जी रही हु
मेरी ये आदत है की थोडी खुशी मे खुश हो जाती हूँ और थोडी सी बात मे मन भर जाता है या ये कहू लड़किया ऐसी ही होती है पता नही अपने बारे मे तो अच्छे से जानती हूँ मेरा या मिजाज़ है
आज मन कर रहा है बस ऑफिस में ही रहू घर भी न जाऊ
किसी से बात करना का भी मन नही कर रहा है
आपने ही सवालो मे बस ,पता नही क्या कर रहा है
पर जो भी है ऐसे मे ऑफिस का भी कम निपटा रही हु
अकले बैठी थी ऐसा मे तृप्ति आकर चपर चपर करने लगी कभी तो खाने को नही पूछती और आज कल तो ज्यादा ही व्यस्त हो गई है
अल इंडिया रेडियो के इस फीचर उनिट आज मे बिल्कुल अकेली हु
मन्ना जी के साथ भक्ति उत्सव मे जाना है
स्टोरी फाइल करनी है
ऑफिस और काम लाइफ इसी का नाम है तो चलते है कवरेज के लिए बाकी का हाल सुनती रहूगी
पुस्तक चर्चाः डोढ़ाय चरित मानस आम आदमी का महाकाव्य और भारतीय लोकतंत्र का
कच्चा चिट्ठा
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मैं लंबे समय से कथा और कथेतर पढ़ता आ रहा हूं. माटी की अद्बुत गंध की वजह से
रेणु जी का लेखन बहुत पसंद रहा है और रेणुजी के बारे में भाई गिरीन्द्रनाथ झा
से सु...
5 days ago

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